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काम क्रोध मद लोभ अहम

सर्वे भवंतु सुखिन:  भाग-1 काम क्रोध मद लोभ अहम  कर ले तू सब को वश में जो गुरू उपदेश के अनुरूप हो ग्रहण करें।  काम क्रोध मद लोभ अहम  कर ले तू सब को वश में यह वेद का संदेश है यह गीता का संदेश है यह दर्शन, उपनिषदों का संदेश है यह बाैद्ध दर्शन का संदेश है यह जैन दर्शन का संदेश है अधिकतर बहुत से ग्रंथों का संदेश है कि  विकारों से आसक्ति ही बंधन है विकारों से अनासक्ति ही मुक्ति है इसीलिये आरती में  विकारों से मुक्‍त होना ही  प्रभु दर्शन/साक्षात्‍कार की कुंजी/चाबी बतायी गयी है इसीलिये आरती में  प्रथम तो प्रश्‍न किया है कि  है जगत के ईश आप अगोचर हैं,  यानि कि आप दिखाई नहीं देते हैं तो किस विधी से आप से मिलें  जिसका उत्‍तर भी  आरती में ही  दिया है कि  विषय विकार मिटाओ  पाप हरो देवा वेद, गीता, दर्शन,  भगवान बुद्ध,  महावीर स्‍वामी आदि  सभी का कहना है कि  जो इन्द्रियों पर विजय पाता है,  वही इन्‍द्रजीत है  वहीं जितेन्द्रिय है,  वही वीर है,  वही मनजीत है,  वही महापुरूष है वही सत्‍पु...

सांचा नाम तेरा

सर्वे भवंतु सुखिन:  🌺  भाग-1  🌺 साँचा नाम तेरा  🌺 जो गुरू उपदेश के अनुरूप हो ग्रहण करें।  🌺 एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति  🌺 सत्य एक ही है,  जिसे ज्ञानीजन विभिन्न नामों से व्‍यक्‍त करते हैं।  🌺 इसके दो अर्थ है  🌺 1.    वह अदृश्‍य शक्ति अथवा  अदृश्‍य तत्‍व एक है,  🌺 हम उसे किसी भी नाम से याद करें  🌺 2.   उस अदृश्‍य शक्ति के द्वारा  प्रदत्‍त ज्ञान भी एक ही है,  चाहे हम उसे किसी भी  भाषा के माध्‍यम से प्रकट करें।  🌺 सत्‍य ज्ञान एक होने के कारण ही  अधिकतर सभी महापुरूषों ने  एक स्‍वर में निम्‍न सात्विक गुणों को स्‍वीकारोक्ति प्रदान की है  🌺 १. अहिंसा  (तन मन वाणी से किसी को दुख नहीं पहुंचाना) 🌺 २. सत्‍य  (तन, मन से सत्‍य आचरण व सत्‍यवादिता) 🌺 ३. अस्‍तेय  (तन मन से चोरी का अभाव) 🌺 ४. ब्रह्मचर्य  (प्रथम अवस्‍था अपने जीवन साथी के अतिरिक्‍त अन्‍य स्‍त्री/पुरष से  अनासक्ति/निष्‍काम प्रेम) 🌺 (द्वितीय और अंतिम अवसथा -  ५० वर्ष अथवा सेवानिवृत्ति...

सूनलो जरा जो गीता में कहा ना सोचो तुम बुरा करो तुम सबका भला। तू काहे करता यह हेरा फेरी, यह माया तेरी है ना मेरी। यह राहे तज दे तू टेढी-मेढी है मानव काया राख की ढेरी।

 सर्वे भंवतु सुखिन: भाग -1  सुन लो जरा जो गीता में कहा  कृपया जो गुरू उपदेश के अनुरूप हो ग्रहण करें।  गीता का यह संदेश है कि  सत्कर्म सात्विकता ही आध्‍यात्मिक उन्‍नति की आधारशिला है। यदि आध्यात्मिक उन्नति के शिखर पर पहुंचना है तो मन में असुरत्‍व रूपी किसी भी तरह के  बूरे विचारों को प्रवेश करने से रोकना ही होगा  धनबल, भुजबल, ओहदे के मद में  मन, वाणी, काया से  कभी भी  किसी का भी  बुरा नही हो  इस बात का ध्यान रखना ही होगा  जहां तक सम्‍भव हो या तो भला ही करना चाहिए  यानी सत्कर्म हीं करने चाहिए अथवा यदि सम्‍भव नहीं हो तो तटस्‍थ रहना चाहिये  यानी यदि परहित के लिए सत्कर्म करने की क्षमता नहीं हो तो कम से कम दूसरों को क्षति पहुंचाने का दुष्कर्म तो बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए  यदि किसी  के आंसू नहीं रोक सकते हैं तो कम से कम किसी की आंख में आंसू लाने का कारण तो कदापि नहीं बनना चाहिए  यदि किसी के सुख का कारण नहीं बन सकते हैँ  तो  किसी के दुख का कारण तो कदापि नहीं बनना चाहिए इसीलिए कहां है  कबीरा ...

जरा तो सोच रे बन्दे खुदा को मुंह दिखाना है, यह दौलत और यह ताकत नहीं कुछ काम आना है, जहां से जायेगा प्यारे बुलावा आयेगा प्यारे बहुत पछतायेगा प्यारे। हिसाब अपना चुकाना है। अकेला ही तू आया था, अकेला ही तू जायेगा। किया जो दान पुण्य तूने वो तेरे काम आयेगा, यहीं सब छोड जाना है। गगन छूने चला है तू तूझे धरती पर सोना है, तेरी औकात ही क्या है तू मिट्टी का खिलौना है यह सच तुझ को बताना है। जिन्हें समझे है तू अपना वो तोडेंगे तेरा सपना, वचन ये याद तू रखना, यह सपना टूट जाना है। जरा तो सोच रे बन्दे खुदा को मुंह दिखाना है, यह दौलत और यह ताकत नहीं कुछ काम आना है,

  सर्वे भवंतु सुखिन:  जरा तो सोच रे बन्दे  खुदा को मुंह दिखाना है,  भाग-1 जरा तो सोच रे बन्दे  खुदा को मुंह दिखाना है,  यह दौलत और यह ताकत  नहीं कुछ काम आना है,  जहां से जायेगा प्यारे  बुलावा आयेगा प्यारे  बहुत पछतायेगा प्यारे।  हिसाब अपना चुकाना है।  अकेला ही तू आया था,  अकेला ही तू जायेगा।  किया जो दान पुण्य तूने  वो तेरे काम आयेगा,  यहीं सब छोड जाना है। गगन छूने चला है तू  तूझे धरती पर सोना है,  तेरी औकात ही क्या है  तू मिट्टी का खिलौना है  यह सच तुझ को बताना है।  जिन्हें समझे है तू अपना  वो तोडेंगे तेरा सपना,  वचन ये याद तू रखना,  यह सपना टूट जाना है। जरा तो सोच रे बन्दे  खुदा को मुंह दिखाना है,  यह दौलत और यह ताकत  नहीं कुछ काम आना है, लगातार -----भाग---2 सर्वे भवंतु सुखिन:  जरा तो सोच रे बन्दे  खुदा को मुंह दिखाना है,  भाग-2 जो गुरू उपदेश के अनुरूप हो ग्रहण करें। हमें अपने धन, बल, बुद्धि के अहंकार में ऐसा कोई कर्म / कोई कार्य नहीं कर...